दीपावली है दीपों की

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दीपावली है दीपों की
काली अंधियारी रातों में
उम्मीद की किरण फैलाते
अंधकार पर विजयश्री का जश्न मनाते
ये नन्हे-नन्हे, इतराते, लहराते, बलखाते
दीपों की
दीपावली है दीपों की

रिश्तों की ठण्ड को थोड़ा गरमानें की
फुरसत के इन पलों में संग बैठने की
थोड़ी अनायास ही बातें करने की
दीपावली है दीपों की

गांवों घरों खेतों-खलियानों में
गलियों-चौराहों में नन्हे भागते
नौनिहालों की
लड्डू, पेड़ा और बर्फी की
दीपावली है दीपों की

माटी के कच्चे-पक्के दीपों की
उस मखमली ठंडी रात में
हवा के ठन्डे झोंखे से
कपकपातें-फड़फड़ातें दीपों की
कुछ जलते, कुछ बुझतें दीपों की
दीपावली हैं दीपों की

आओ इस दीपावली कुछ दीप जलायें
थोड़ी खुशियां उन घरों में भी पहुचायें
चाकों की उस संस्कृति को फिर जगाएं
थोड़ा #MadeinIndia बन जाएँ
थोड़ा #GoLocal हो जाएँ
क्योंकि
दीपावली है दीपों की

ना इन बिजली के बल्बों की
ना इन बेतरतीब उपकरणों की
ना इस धुआं की, ना शोर शराबे की
न प्रदूषण में जलती धरा की
दीपावली है दीपों की

आओ थोड़ा हिंदुस्तानी बन जाएँ
कुछ अपना सा #EarthHour मनाएं
क्योंकि
दीपावली है दीपों की
सम्पन्नता और सौहार्द की
अंधकार में भी उजियारे की

दीपावली है दीपों की

-आनन्द कुमार

Dipawali Hai Dipon Ki
(c) 2018 Anand Kumar anand@anandkumar.net
CC BY-SA
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